कबीर भगत था भगवान नही

निमलिखित कबीर वानी से आपको लगता है कि कबीर भगवान था
"कबीर कूकर रामका मुतिया मेरा नाऊँ गले रामकी जेवड़ी जै खैंचे तै जांऊँ "
चलती चाकी देख के दिया कबीरा रोये दो पाटन के बीच में साबित बचा न कोये |
जब रामबुलावा भेजया दिया कबीरा रोये जो शुख साधु संग मे बेकुण्ठ न होऐ |

वेद की पुत्री सिमर्ति भाई सांकल जेवड़ी लै है आई |
अपना नगर आप ते बाधिया ..कह कबीर मै राम कहि छूटिया |

बहुरि हम काहैं कूँ आवहिंगे।
बिछुरे पंचतत्त की रचना, तब हम रामहि पावहिंगे॥टेक॥
पृथी का गुण पाँणी सोष्या, पाँनी तेज मिलावहिंगे॥
तेज पवन मिलि सबद मिलि, सहज समाधि लगावहिंगे॥
जैसे बहु कंचन के भूषन, ये कहि गालि तवावहिंगे॥
ऐसै हम लोक वेद के बिछुरें, सुनिहि माँहि समावहिंगे॥
जैसे जलहि तरंग तरंगनी, ऐसैं हम दिखलावहिंगे॥
कहै कबीर स्वामी सुख सागर, हंसहि हंस मिलावहिंगे॥150॥

कबीरा संत नदी गया बहि रे,
ठाढ़ी माइ कराड़े टेरै, है कोई ल्यावैगहि रे॥टेक॥
बादल बाँनी राम घन उनयाँ, बरिषै अमृत धारा॥
सखी नीर गंग भरि आई, पीवै प्राँन हमारा॥
जहाँ बहि लागे सनक सनंदन, रुद्र ध्याँन धरि बैठे॥
सूर्य प्रकास आनंद बमेक मैं घर कबीर ह्नै पैठे॥151॥
परोसनि माँगै संत हमारा,

पीव क्यूँ बौरी मिलहि उधारा॥टेक॥
मासा माँगै रती न देऊँ, घटे मेरा प्रेम तो कासनि लेऊँ।
राखि परोसनि लरिका मोरा, जे कछु पाउं सू आधा तोरा।
बन बन ढूँढ़ौ नैन भरि जोऊँ, पीव न मिलै तौ बिलखि करि रोऊँ।
कहै कबीर यहु सहज हमारा, बिरली सुहागनि कंत पियारा॥371॥

राम चरन जाकै हिरदै बसत है, ता जन कौ मन क्यूँ डोलै।
मानौ आठ सिध्य नव निधि ताकै हरषि हरषि जस बोलै॥टेक॥
जहाँ जहाँ जाई तहाँ सच पावै, माया ताहि न झोलै।
बार बार बरजि बिषिया तै, लै नर जौ मन तोलै॥
ऐसी जे उपजै या जीय कै, कुटिल गाँठि सब खोलै॥
कहै कबीर जब मनपरचौ भयौ, रहे राम के बोलै॥372॥

जंगल मैं का सोवनां, औघट है घाटा,
स्यंध बाघ गज प्रजलै, अरु लंबी बाटा॥टेक॥
निस बासुरी पेड़ा पड़ै, जमदानी लूटै।
सूर धीर साचै मते, सोई जन छूटै॥
चालि चालि मन माहरा, पुर परण गहिये।
मिलिये त्रिभुवन नाथ सूँ, निरभै होइ रहिये॥
अमर नहीं संसार मैं, बिनसै नरदेही।
कहै कबीर बेसास सूँ, भजि राम सनेही॥373॥
ऐसै मन लाइ लै राम रसनाँ,

कपट भगति कीजै कौन गुणाँ॥टेक॥
ज्यूँ मृग नादैं बध्यौ जाइ, प्यंड परे बाकौ ध्याँन न जाइ।
ज्यूँ जल मीन तेत कर जांनि, प्रांन तजै बिसरै नहीं बानि॥
भ्रिगी कीट रहै ल्यौ लाइ, ह्नै लोलीन भिंरग ह्नै जाइ॥
राम नाम निज अमृत सार, सुमिरि सुमिरि जन उतरे पार॥
कहै कबीर दासनि को दास, अब नहीं छाड़ौ हरि के चरन निवास॥

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