परमात्मा निराकार है -- बाहरांपदी रमैणी कबीर ग्रन्थावली
परमात्मा निराकार है बाहरांपदी रमैणी कबीर ग्रन्थावली में साफ लिखा है पर कुछ लोग सच जानते हुऐ भी अन्जान बने हुऐ हैं । आओ देखें परमान। पहली मन में सुमिरौ सोई, ता सम तुलि अवर नहीं कोई॥ कोई न पूजै बाँसूँ प्रांनां, आदि अंति वो किनहूँ न जाँनाँ॥ रूप सरूप न आवै बोला, हरू गरू कछू जाइ न तोला॥ भूख न त्रिषां धूप नहीं छांही, सुख दुख रहित रहै सब मांही॥ अविगत अपरंपार ब्रह्म, ग्याँन रूप सब ठाँम॥॥ बहु बिचारि करि देखिया, कोई न सारिख राँम॥ जिहि जग की तस की तस के ही, आपै आप आथिहै एही॥ कोई न लखई वाका भेऊ, भेऊ होई तो पावै भेऊ॥ बावैं न दांहिनै आगै न पीछू, अरध उरध रूप नहीं कीछू॥ माय न बाप आव नहीं जावा, नाँ बहु जण्याँ न को वहि जावा॥ वो है तैसा वोही जानै, ओही आहि आहि नहीं आँनै॥ नैनाँ बैंन अगोचरीं, श्रवनाँ करनी सार। बोलन कै सुख कारनै, कहिये सिरजनहार॥ अरचिंत अविगत है निरधारा, जांष्यां जाइ न वार न पारा॥ लोक बेद थै अछै नियारा, छाड़ि रह्यौ सबही संसारा॥ जसकर गांउ न ठांउ न खेरा, कैसें गुन बरनूं मैं तेरा॥ नहीं तहाँ रूप रेख गुन बांनां, ऐसा साहिब है अकुलां...