Malaar Mehla 1, ਮਲਾਰ ਮਹਲਾ ੧ ॥ Page 1257, Shri Guru Granth Sahib
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मलार महला 1
( ये वार्तालाप नानक जी और एक कूंज यानि परी के बीच हुई)
""बागै कापड़ बोलै बैण "
भावर्थ = नानक जी पूछते हैं जैसे सफेद पंखो वाली (कूंज मीठे) बोल बोलती है
"" लमा नक काले तेरे नैण"
भावर्थ = हे बहन उसी तरहं तेरे सुंदर काले बाल और आंखें हैं
"" कबहुं साहिबु देखया भैण|"
भावर्थ = पर हे बहन जिसने तेरे को ये सुंदरता दी कभी तुमने उस मालिक के दर्शन किये हैं
"" ऊडां ऊड़ि चड़ां असमानि साहिब समिर्थ तेरै ताणि "
भावर्थ =परी बोली उस सारी ताकतों के मालक प्रभु! मै (कूंज) उसकी दी हुई ताकतों से ही उड़कर असमान मे उड़कर चड जाती हूँ
भाव हे प्रभु! जे मैं जीव इस्त्री अपने सुंदर अंगों का मान करती हूँ ये तेरे ही दिए हुऐ हैं
"" जलि थलि डूंगरि देखां तीर ""
भावर्थ = (उस प्रभु के मेहर से) मै धरती मे, जल मे ,पहाडों मे , जलासयों के किनारे (प्रभु) देखती हूँ
"" थान थनंतरि साहिबु बीर ""||२||
भावर्थ = हे भाई! प्रभु हर जगह पर है
"" जिनि तनु साजि दिऐ नालि खंभ "
भावर्थ = हे बीर! जिस मालिक ने यह शरीर बनाकर साथ मे यह तीखे सुंदर अंग बनाऐ हैं
"" अति तृष्णा उडने कि ढंझ"
भावर्थ = ये उड़ने की बहुत इच्छा भी प्रभु ने ही मेरे अंदर पैदा की है
""" नदरि करे तां बंदा धीर ""
भावर्थ = जब प्रभु मुझे मेहर करता है तो मै (उड़ने की इच्छा पर) धीरज रखती हूं
"" जिओं विखाले तिओं वेखां बीर "" ||३||
भावर्थ = हे भाई! जैसे जैसे वो जो कुछ दिखता है वैसे ही मैं देखती हूँ
"" न एह तन जाऐगा न जाहिगे खंभ"
भावर्थ = न तो यह शरीर साथ जाना है और न ही यह सुंदर अंग |
"" पऊणे पानी अग्नि का सनबंध ""
भावर्थ = यह शरीर तो हवा पानी आग तत्वों का मेल है (जो नष्ट हो जायेगा)
"" नानक करमु र्होवैे जपिऐ करि गुरु पीरु""
भावर्थ = नानक कहता है जब प्रभु की मेहर होती है तभी किसी गुरु पीर का पला पकड़ कर प्रभु को सिमरिया जा सकता है
"" सचि समावै ऐहु शरीरु ""||४||
भावर्थ = तब यह शरीर उस सदा स्थिर मालिक मे लीन रहता है
मलार महला 1
( ये वार्तालाप नानक जी और एक कूंज यानि परी के बीच हुई)
""बागै कापड़ बोलै बैण "
भावर्थ = नानक जी पूछते हैं जैसे सफेद पंखो वाली (कूंज मीठे) बोल बोलती है
"" लमा नक काले तेरे नैण"
भावर्थ = हे बहन उसी तरहं तेरे सुंदर काले बाल और आंखें हैं
"" कबहुं साहिबु देखया भैण|"
भावर्थ = पर हे बहन जिसने तेरे को ये सुंदरता दी कभी तुमने उस मालिक के दर्शन किये हैं
"" ऊडां ऊड़ि चड़ां असमानि साहिब समिर्थ तेरै ताणि "
भावर्थ =परी बोली उस सारी ताकतों के मालक प्रभु! मै (कूंज) उसकी दी हुई ताकतों से ही उड़कर असमान मे उड़कर चड जाती हूँ
भाव हे प्रभु! जे मैं जीव इस्त्री अपने सुंदर अंगों का मान करती हूँ ये तेरे ही दिए हुऐ हैं
"" जलि थलि डूंगरि देखां तीर ""
भावर्थ = (उस प्रभु के मेहर से) मै धरती मे, जल मे ,पहाडों मे , जलासयों के किनारे (प्रभु) देखती हूँ
"" थान थनंतरि साहिबु बीर ""||२||
भावर्थ = हे भाई! प्रभु हर जगह पर है
"" जिनि तनु साजि दिऐ नालि खंभ "
भावर्थ = हे बीर! जिस मालिक ने यह शरीर बनाकर साथ मे यह तीखे सुंदर अंग बनाऐ हैं
"" अति तृष्णा उडने कि ढंझ"
भावर्थ = ये उड़ने की बहुत इच्छा भी प्रभु ने ही मेरे अंदर पैदा की है
""" नदरि करे तां बंदा धीर ""
भावर्थ = जब प्रभु मुझे मेहर करता है तो मै (उड़ने की इच्छा पर) धीरज रखती हूं
"" जिओं विखाले तिओं वेखां बीर "" ||३||
भावर्थ = हे भाई! जैसे जैसे वो जो कुछ दिखता है वैसे ही मैं देखती हूँ
"" न एह तन जाऐगा न जाहिगे खंभ"
भावर्थ = न तो यह शरीर साथ जाना है और न ही यह सुंदर अंग |
"" पऊणे पानी अग्नि का सनबंध ""
भावर्थ = यह शरीर तो हवा पानी आग तत्वों का मेल है (जो नष्ट हो जायेगा)
"" नानक करमु र्होवैे जपिऐ करि गुरु पीरु""
भावर्थ = नानक कहता है जब प्रभु की मेहर होती है तभी किसी गुरु पीर का पला पकड़ कर प्रभु को सिमरिया जा सकता है
"" सचि समावै ऐहु शरीरु ""||४||
भावर्थ = तब यह शरीर उस सदा स्थिर मालिक मे लीन रहता है
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